शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग 44)सीता-स्वयंवर—परशुराम-लक्ष्मण-संवाद

परशुराम- लक्ष्मण- संवाद :

सीता-स्वयंवर एवं धनुष-यज्ञ का पावन दृश्य- सीता-स्वयंवर में माता सीता प्रभु श्रीराम जी को जयमाल पहनाती हुईं


प्रस्तावना: रामजन्म के अलौकिक कारण 🌟✨

(आप सभी ने इसके पहले के पृष्ठों पर भगवान रामजन्म के 5 कारण पढ़े ,जो शिवजी ने माता पार्वती को सुनाए। इन्हीं कारणों के परिणाम स्वरुप भगवान श्री राम ने अयोध्या में अवतार लिया ।)


📚 पूर्व कथाओं की झलक (पिछले भाग की लिंक)




प्रभु दोउ चापखंड महि डारे । देखि लोग सब भए सुखारे ॥

कौसिकरूप पयोनिधि पावन । प्रेम बारि अवगाहु सुहावन ॥

( पिछले पृष्ठ पर आप सभी ने पढ़ा कि भगवान श्री राम ने विश्वामित्र जी की आज्ञा से शंकर जी का धनुष पिनाक को तोड़कर उसके दो टुकड़े करके भूमि पर डाल दिये।)

 

आगे की कथा—

🌿 मिथिला में आनंद का वातावरण :

मिथिला में सभी नर- नारी आपस में बात कर रहे हैं और प्रसन्न हो रहे हैं कि राम जी ने शंभू जी के धनुष को (पिनाक को) तोड़ दिया है।


🌸 सीता जी का जयमाल के लिए आगमन :

सतानंद तब आयसु दीन्हा । सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा ॥

शतानंद जी ने सीता जी की सखियों को आदेश दिया कि वे जयमाल के लिए सीता जी को सभा में लेकर आएँ। सखियाँ सीता माता को लेकर आई हैं। एक चतुर सखी ने कहा—  

"जयमाला पहनाइए।" 


💐 श्रीराम के गले में जयमाला :

 सीता माता ने राम जी के गले में जयमाला पहनाई। सखियाँ बधाई गीत गा रही हैं।  मिथिला में आनंदोत्सव मनाया जा रहा है। इसी बीच—


परशुराम- लक्ष्मण- संवाद :


⚡ परशुराम जी का क्रोधपूर्ण आगमन :


वहाँ परशुराम जी आ गए। सभी ने परशुराम जी को प्रणाम किया। अचानक परशुराम जी की दृष्टि टूटे हुए पिनाक पर गई ।धनुष को टूटा हुआ देख जनक जी से बोले—

 "जिसने भी इस धनुष को तोड़ा है ,उसे तुरंत बाहर निकालो नहीं तो मैं जहाँ तक तुम्हारा राज्य है, वहाँ तक संपूर्ण पृथ्वी को मैं उलट- पलट कर दूँगा। "


🏹 श्रीराम की विनम्रता :


जनक जी थर-थर काँपने लगे। तभी श्री राम जी आगे बढ़कर बोले —


नाथ संभुधनु भंजनिहारा । होइहि केउ एक दास तुम्हारा ॥


"हे नाथ! शंभू जी के धनुष को जिसने भी तोड़ा है वह यहाँ पर ही आपका कोई दास भी हो सकता है।"

परशुराम जी बोले कि "दास नहीं जिसने भी इस धनुष को तोड़ा है, वह सहस्त्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।"

 "निकाल कर उसको बाहर करो, नहीं तो मैं बार-बार कहता हूँ  कि ये सब राजा मारे जाएँगे।" 



धनुष-भंग के बाद परशुराम जी  के आगमन का अद्भुत दृश्य


🔥 लक्ष्मण और परशुराम के बीच संवाद :


लक्ष्मण जी परशुराम जी के पास गए और मुस्कुरा कर बोले—

आप धनुष टूटने पर ही आते हैं ना। तो बचपन में खेल-खेल में मैं प्रतिदिन धनुष तोड़ देता था । तब आप वहाँ क्यों नहीं आए! आपको इसी धनुष से इतना प्रेम क्यों है ?


परशुराम जी बोले

"रे बालक ! यह तुम नहीं बोल रहे हो बल्कि तुम्हारा काल तुमसे बुलवा रहा है। इस पिनाक की तुलना अपने उन छोटे-छोटे धनुष से कर रहे हो !

लक्ष्मण जी बोले 

 "धनुष चाहे छोटा हो या बड़ा। दोनों का काम एक ही है- बाण चलाना।"

लखन कहा हँसि हमरें जाना । सुनहु देव सब धनुष समाना ॥

 "और आप पूछ रहे हैं ना कि किसने तोड़ा है तो भैया ने उसे तोड़ा नहीं है । जैसे ही उसे छुआ, वह टूट गया। भीतर से खोखला हो गया था।"

छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू । मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ॥


⚔️ परशुराम का बढ़ता हुआ क्रोध :

परशुराम जी ने अपना फरसा निकाला और बोले—

"तू मुझे जानता नहीं है। केवल मुनिगण ही मुझे जानते हैं। मैं अत्यंत क्रोधी महात्मा हूँ । क्षत्रिय कुल-द्रोही हूँ। 21 बार मैंने इस पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन किया है । बालक जानकर मैं तुझे मार नहीं रहा हूँ।" 

लक्ष्मण जी बोले—

"जय हो ! जय हो ! आपकी। मैं बहुत  भाग्यशाली हूँ। जीवन में पहली बार ऐसे वीर को देखा है, जो अपनी प्रशंसा स्वयं अपने ही मुख से कर रहा है।"

इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥

भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी ॥

सुर महिसुर हरिजन अरु गाई । हमरें कुल इन्ह पर न सुराई

लक्ष्मण जी बोले —

"हम कोई कुम्हड़े की बतिया नहीं हैं जो तर्जनी को देखकर डर जाएँगे। हमारे कंधे पर भी धनुष- बाण है।आप कितना ही फरसा दिखाइए, किंतु हम आपसे लड़ेंगे नहीं । क्योंकि हमारे कुल में ब्राह्मणों पर, संतों पर, भक्तों पर, सुर पर और गौ माताओं पर प्रहार नहीं किया जाता है।"

"हम रघुवंशी हैं । यदि हम आपसे लड़ते हैं और आप मेरे द्वारा मारे गए तो मुझे ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा और यदि मैं हार गया तो मेरा कुल कलंकित होगा । इस प्रकार दोनों ही ओर से मेरी ही हानि होगी।"


🌼 श्रीराम द्वारा स्थिति को शांत करना :

लक्ष्मण जी की बातें सुनकर परशुराम जी का क्रोध और भी बढ़ रहा है। शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा है। अंत में रामचंद्र जी स्वयं बोले

"मुनिवर ! मेरा अपराध इतना बड़ा नहीं है, जितना बड़ा आपका क्रोध है । धनुष पुराना था। बस छूते ही टूट गया।  हम रघुवंशी हैं, अपने कुल की बड़ाई नहीं कर रहा हूँ। हम रघुवंशियों का स्वभाव है कि हम काल से भी नहीं डरते हैं । किंतु यह रघुवंशी राम आज परशुराम से नहीं लड़ेगा ।क्योंकि आप ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण के चरणों में निष्ठा रखने वाला,  इस संसार में निर्भय होकर रहता है इस रहस्य को मैं जानता हूँ इसलिए मैं आपसे युद्ध नहीं करूँगा।" 


✨ परशुराम जी को श्रीराम का दिव्य स्वरूप ज्ञात होना :

परशुराम जी समझ गए कि ब्राह्मण में निष्ठा रखने वाले स्वयं श्री हरि ही हो सकते हैं। अतः उन्होंने जान लिया कि ये श्री राम साक्षात ब्रह्म हैं। 


🌿 परशुराम जी का वन की ओर प्रस्थान :

रघुनाथ जी की जय- जयकार की और तपस्या करने के लिए वन में चले गए।


कहि जय जय जय रघुकुलकेतू । भृगुपति गए बनहि तप हेतू


शेष अगले पृष्ठ पर....


 

❓ FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1️⃣ शतानंद कौन थे?
शतानंद मिथिला के राजा जनक के राजपुरोहित थे। वे महर्षि गौतम और माता अहिल्या के पुत्र थे।

2️⃣ सहस्त्रबाहु कौन थे?
सहस्त्रबाहु का वास्तविक नाम कार्तवीर्य अर्जुन था। वे हैहय वंश के अत्यंत शक्तिशाली राजा थे।

3️⃣ परशुराम जी के बारे में संक्षिप्त जानकारी क्या है?
परशुराम जी भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। वे महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के पुत्र थे।

4️⃣ परशुराम जी को क्रोध क्यों आया?
भगवान शिव का धनुष पिनाक टूटा देखकर उन्हें लगा कि किसी ने उनके आराध्य का अपमान किया है।

5️⃣ लक्ष्मण जी ने परशुराम जी से वाद-विवाद क्यों किया?
लक्ष्मण जी स्वभाव से निर्भीक थे, इसलिए उन्होंने तर्क और विनोद के साथ उत्तर दिए।

6️⃣ श्रीराम जी ने परशुराम जी से युद्ध क्यों नहीं किया?
परशुराम जी ब्राह्मण थे, इसलिए श्रीराम जी ने विनम्रता और धर्म का पालन करते हुए युद्ध नहीं किया।

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