शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग 44)सीता-स्वयंवर—परशुराम-लक्ष्मण-संवाद
( भगवान रामजन्म के 5 कारणों को अवश्य पढ़ें ,जो शिवजी ने माता पार्वती को सुनाए। इन्हीं कारणों के परिणाम स्वरुप भगवान श्री राम ने अयोध्या में अवतार लिया ।)
(पिछले पृष्ठ पर आप सभी ने पढ़ा कि बंदीजनो ने सभा के मध्य में राजा जनक जी का प्रण सुनाया ।)
"जो भी इस पिनाक को उठाकर, उसकी प्रत्यंचा चढाकर तोड़ेगा, त्रैलोक्य में उसकी कीर्ति फैलेगी और जनक जी अपनी लाडली जी का विवाह उसी वीर पुरुष के साथ करेंगे।"
सभी राजा प्रण सुनकर धनुष तोड़ने के लिए उतावले हो उठे। बंदी जनों ने सबसे पहले जो राजा बैठे थे, उन्हें बुलाया और धनुष तोड़ने की आज्ञा दी।
राजा ने सबसे पहले अपना परिकर अर्थात अपनी धोती को ठीक किया, मुकुट को संभाला और अपने इष्ट देव को प्रणाम करके मन ही मन कहा कि प्रभु जा रहा हूँ, कृपा कीजिएगा, हमसे धनुष टूट जाए।
गोस्वामी जी लिखते हैं —
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे । भटमानी अतिसय मन माखे ॥
परिकर बाँधि उठे अकुलाई । चले इष्ट देवन्ह सिर नाई ॥
जैसे-जैसे राजाओं को आदेश मिलता है, राजा तमक कर यानी क्रोध के साथ, घमंड के साथ बहादुरी दिखाते हुए उठते हैं और धनुष के पास तक जाते हैं।वहाँ जाकर धनुष तोड़ना तो दूर उसे तिल मात्र हिला भी नहीं सके और अंत में सभी राजा सिर नीचा कर के अपने स्थान पर बैठ जाते हैं।
एक राजा की बारी आई तो उन्होने अपने ही स्थान पर खड़े होकर धनुष को प्रणाम किया और बैठ गए। ऐसा देखकर अन्य सभी राजाओं ने कहा —
"क्या आपकी भुजाओं में बल नहीं है! जो धनुष को उठा सके।" राजा ने उत्तर दिया —
"सीता भूमि की पुत्री हैं इसलिए वे भूमिजा कहलाती हैं और हम भूपति हैं। इस रिश्ते से सीता हमारी पुत्री हुई तो मैं अपनी पुत्री के साथ विवाह कैसे कर सकता हूँ! इसलिए हम पुत्री को आशीर्वाद देने आए हैं।"
सभा में 10000 राजा आए हैं। जब एक भी राजा धनुष को हिला तक ना सका तब उन राजाओं ने निश्चय किया कि हम सभी एक साथ मिलकर इस धनुष को तोड़ेगे । फिर भी शिवजी का धनुष हिला तक नहीं ।
सभी राजा वापस लौट आये और अपने-अपने स्थान पर सिर झुकाकर बैठ गए।
राजाओं के सिर झुकाकर बैठ जाने का दृश्य देखकर जनक जी महाराज आवेश में आ गए।
जनक जी क्रोधित होकर बोले —
"आप सब लोग मेरा प्रण सुनकर स्वयं अपनी-अपनी सहमति से यहाँ आए हैं। मैंने आप लोगों को नहीं बुलाया है। यह भी मत समझिएगा कि मैं किसी को पहचान नहीं रहा हूँ! यहाँ पर सभी देवता, दानव, नाग, मनुष्य राजाओं के वेश में आए हुए हैं। आप सभी ने धनुष को तोड़ना तो दूर की बात है,उसे तिल मात्र हिला भी ना सके।"
"आज ऐसा मालूम पड़ रहा है कि ब्रह्मा जी ने मेरी पुत्री सीता के लिए कोई वर रचा ही नहीं है। एक बात और ध्यान से सुनिएगा कि आज के बाद आप में से कोई भी यह नहीं कहेगा कि मैं वीर हूँ। आज मैं (राजा जनक) जान गयाटटट हूँ कि यह धरती वीरों से रिक्त हो चुकी है । इसलिए अब आप लोग विवाह की आस छोड़कर अपने-अपने घर वापस लौट जाइए। "
"यदि मैं आज अपने प्रण का त्याग करता हूँ, तो मेरे जीवन- भर की कीर्ति कलंकित हो जाएगी और यदि अपने प्रण पर अडिग रहता हूँ, तो मेरी आँखों के सामने मेरी पुत्री सीता कुँवारी ही रह जाएगी । यदि मैं (राजा जनक) जानता कि यह धरती वीरों से खाली हो चुकी है तो मैं ऐसा प्रण कभी नहीं करता।"
लक्ष्मण जी ने राजा जनक जी के मुख से निकले शब्दों को सुना कि इस धरती पर अब कोई वीर नहीं बचा है।यह सुनकर लक्ष्मण जी क्रोध से तमतमा उठे,क्रोध से भौंहें तन गई ।
गोस्वामी जी लिखते हैं —
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई । तेहिं समाज अस कहइ न कोई ॥
कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान रघुकुल मनि जानी ॥
सुनहु भानुकुल पंकज भानू।कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू॥
जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं । कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं ॥
काचे घट जिमि डारौं फोरी । सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी ॥
तव प्रताप महिमा भगवाना । को बापुरो पिनाक पुराना ॥
नाथ जानि अस आयसु होऊ।कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ॥
कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं ।जोजन सत प्रमान लै धावौं॥
तोरौं छत्रक दंड जिमि, तव प्रताप बल नाथ ।
जौं न करौं प्रभु पद सपथ, कर न धरौं धनु भाथ ॥
लक्ष्मण जी सभा में खड़े हुए और श्री राम जी को प्रणाम करके बोले—
"यदि रघुवंश का एक छोटा- सा बालक भी कहीं खड़ा हो जाए तो ब्रह्मांड में किसी में भी ऐसी हिम्मत नहीं यह बोलने की कि पृथ्वी पर कोई वीर नहीं है ।
भैया, आप के रहते जनक जी ने यह कैसे बोल दिया कि पृथ्वी पर अब कोई वीर नहीं बचा है! जनक जी ने यह अनुचित वाणी कैसे बोल दी!"
लक्ष्मण जी गरजे और बोले —
"भैया आप बैठे हैं, यदि आप आज्ञा दें तो यह धनुष क्या वस्तु है - जिस प्रकार बच्चे खेल-खेल में गेंद उछालते हैं, उसी प्रकार मैं यह पूरा ब्रह्मांड उछाल दूँगा।
बच्चे जिस प्रकार कच्चे घड़े को फोड़ कर चूर-चूर कर देते हैं; उसी प्रकार मैं इस ब्रह्मांड को खंड-खंड कर दूँगा।
जिस प्रकार बच्चे खेतों से मूली उखाड़ कर ले आते हैं, उसी प्रकार मैं सुमेर पर्वत को उखाड़ कर फेंक दूँगा।
बरसात में उगे छत्र (कुकुरमुत्ता) को जिस प्रकार बच्चे रौंद डालते हैं, मैं रौंद डालूंगा इस धनुष को ।
मैं इस धनुष को हाथ में लेकर 100 योजन तक दौड़ता चला जाऊँगा और अगर ऐसा नहीं कर पाया, तो यह प्रण लेता हूँ कि मैं जीवन-भर अपने हाथ में धनुष बाण नहीं लूँगा।
क्रोधित होकर लक्ष्मण जी ने यह नहीं कहा कि मैं करूँगा,हे राम जी! आपके प्रताप से करूँगा ।
(तव प्रताप बल नाथ...)
लक्ष्मण जी गरजे तो पूरी धरती काँपने लगी । राजाओं के आसन डोलने लगे । राम जी और सीता मैया प्रसन्न हो गई। जनक जी डर गए।
राम जी ने संकेत करके लक्ष्मणजी को बुलाया और अपने पास प्रेम पूर्वक बिठाकर समझाया कि हम लोग यहाँ धनुष-यज्ञ देखने आए हैं।
तुलसीदास जी लिखते हैं —
बिस्वामित्र समय सुभ जानी । बोले अति सनेहमय बानी ॥
उठहु राम भंजहु भवचापा । मेटहु तात जनक परितापा ॥
विश्वामित्र जी ने विचार किया कि अब समय आ गया है रामचंद्र जी को भेजा जाए। इसलिए उन्होंने रामचंद्र जी से कहा कि "हे रघुनाथ ! अब उठो और धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाओ।"
गुरु के वचन सुनकर श्री राम जी सहज भाव से खड़े हुए और धनुष की ओर चल पड़े।
तुलसीदास जी लिखते हैं —
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा । हरषु बिषादु न कछु उर आवा ॥
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ । ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ ॥
जब श्री राम जी धनुष तोड़ने के लिए चले, तब मिथिला के सभी नर-नारी अपने पितरों से देवताओं से प्रार्थना करने लगे हमारे जीवन के सारे पुण्य कर्म ले लो किंतु मेरी विनती सुन लीजिए कि "जिस प्रकार से कमल की नाल को बच्चे उखाड़ कर फेंक देते हैं उसी प्रकार से आज राम जी इस धनुष को तोड़ दें।"
माता जानकी देवी भवानी और शंकर जी से प्रार्थना करने लगी । वे व्याकुल होकर मन- ही- मन मना रही हैं - "हे महेश-भवानी! मुझ पर प्रसन्न होइए, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिए और मुझ पर स्नेह करके धनुष के भारीपन को हर लीजिए।"
"हे गणों के नायक, वर देने वाले देवता गणेशजी! मैंने आज ही के लिए तुम्हारी सेवा की थी । बार-बार मेरी विनती सुनकर धनुष का भारीपन बहुत ही कम कर दीजिए ।"
राम जी ने सीता जी की व्याकुलता को देखा और सीता जी की व्याकुलता को देखकर धनुष की ओर देखने लगे । फिर गुरु जी के पास बैठे लक्ष्मण जी को देखने लगे।
लक्ष्मण जी ने देखा कि अब भैया धनुष उठाने वाले हैं। लक्ष्मण जी गुरु जी के पास ही खड़े हो गए और अपने दाहिने पैर से धरती को दबाने लगे।कहने लगे—
"हे शेषनारायण , वराह, दिगपाल! आप सभी लोग धरती को पकड़ कर बैठिए। रामचंद्र जी अब शंकर जी के धनुष को तोड़ना चाह रहे हैं ।सभी लोग सजग हो जाइए।"
तुलसीदास जी लिखते हैं —
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा । अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा ॥
श्री राम जी धनुष के पास पहुँचे और मन- ही- मन अयोध्या में बैठे अपने गुरु वशिष्ठ जी को, अपने इष्ट देव शिवजी को को प्रणाम किया और धनुष की परिक्रमा की।
उसके बाद धनुष के बीचों-बीच भगवान ने अपना हाथ रखा जैसे ही भगवान ने अपना हाथ रख की बिजली की चकाचौंध छा गई।
धनुष को लिया, प्रत्यंचा चढ़ाई और जोर से खींचते हुए किसी ने नहीं लखा (अर्थात ये तीनों काम इतनी फुर्ती से हुए कि धनुष को कब लिया, कब चढ़ाया और कब खींचा, इसका किसी को पता नहीं लगा), सबने श्री रामजी को (धनुष खींचे) खड़े देखा । उसी क्षण श्री रामजी ने धनुष को बीच से तोड़ डाला । भयंकर कठोर ध्वनि से (सब) लोक भर गए
तुलसीदास जी लिखते हैं —
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें । काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें ॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा । भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ॥
घोर, कठोर शब्द से (सब) लोक भर गए, सूर्य के घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे । दिग्गज चिग्घाड़ने लगे, धरती डोलने लगी, शेष, वाराह और कच्छप कलमला उठे । देवता, राक्षस और मुनि कानों पर हाथ रखकर सब व्याकुल होकर विचारने लगे कि क्या हो रहा है!
(जब सब को निश्चय हो गया कि) श्री रामजी ने धनुष को तोड़ डाला, तब सब
‘श्री रामचन्द्र की जय’ बोलने लगे।
तुलसीदासजी लिखते हैं—
भे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले ।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं ।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे । देखि लोग सब भए सुखारे ॥
कौसिकरूप पयोनिधि पावन । प्रेम बारि अवगाहु सुहावन ॥
शेष अगले पृष्ठ पर....
1️⃣ यह प्रसंग किस कथा से संबंधित है?
यह प्रसंग शिव-पार्वती संवाद कथा के अंतर्गत सीता-स्वयंवर में शिव-धनुष भंग के महाप्रसंग से संबंधित है।
2️⃣ राजा जनक सभा में क्रोधित क्यों हुए?
क्योंकि सभा में उपस्थित कोई भी राजा भगवान शिव के पिनाक धनुष को उठाने अथवा हिलाने में भी समर्थ नहीं हो सका।
3️⃣ लक्ष्मण जी को सभा में क्रोध क्यों आया?
जब राजा जनक ने कहा कि पृथ्वी वीरों से रिक्त हो चुकी है, तब रघुवंश की मर्यादा की रक्षा हेतु लक्ष्मण जी को अत्यंत क्रोध आया।
4️⃣ मुनि विश्वामित्र ने श्रीराम को क्या आज्ञा दी?
मुनि विश्वामित्र ने शुभ समय जानकर श्रीराम को शिव-धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने की आज्ञा दी।
5️⃣ शिव-धनुष भंग के समय क्या घटित हुआ?
श्रीराम द्वारा धनुष भंग करते ही भयंकर ध्वनि हुई, पृथ्वी डोल उठी और चारों ओर “जय श्रीराम” का जयघोष होने लगा।
6️⃣ ‘परिकर’ शब्द का अर्थ और उसके पर्यायवाची क्या हैं?
परिकर का अर्थ है—वस्त्र को कसकर बाँधना या युद्ध के लिए स्वयं को तैयार करना।
इसके पर्यायवाची हैं—धोती, वेष, सज्जा, तैयारी, कमरबंध।
7️⃣ ‘भूमिजा’ शब्द का अर्थ और उसके पर्यायवाची क्या हैं?
भूमिजा का अर्थ है—भूमि से उत्पन्न हुई, अर्थात माता सीता।
इसके पर्यायवाची हैं—जानकी, मैथिली, वैदेही, सीता।
8️⃣ ‘भूपति’ शब्द का अर्थ और उसके पर्यायवाची क्या हैं?
भूपति का अर्थ है—पृथ्वी का स्वामी, राजा।
इसके पर्यायवाची हैं—नृप, नरेश, महाराज, नृपति।
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Jai shree Ram
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