शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग 46)सीता-स्वयंवर—श्रीराम-सीता का अयोध्या आगमन
(आप सभी ने इसके पहले के पृष्ठों पर भगवान रामजन्म के 5 कारण पढ़े ,जो शिवजी ने माता पार्वती को सुनाए। इन्हीं कारणों के परिणाम स्वरुप भगवान श्री राम ने अयोध्या में अवतार लिया ।)
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू।भृगुपति गए बनहि तप हेतू॥
(आप सभी ने पढ़ा कि श्री परशुराम जी समझ गए कि ब्राह्मण में निष्ठा रखने वाले स्वयं श्री हरि ही हो सकते हैं। अतः उन्होंने जान लिया कि ये श्री राम साक्षात ब्रह्म हैं। रघुनाथ जी की जय- जयकार की और तपस्या करने के लिए वन में चले गए।)
आइए कथा को आगे बढ़ाते हैं—
परशुराम जी के जाने के बाद मुनि विश्वामित्र जी ने जनक जी से कहा —
"आप अपने घर के बड़े या गुरुजनों से बात कीजिए और विवाह के कार्यक्रम को आगे बढ़ाइए।"
जनक जी ने अपने कुलगुरु से विचार- विमर्श किया और उनकी आज्ञा से दूतों को पत्र देकर अयोध्या नगरी भेजा गया। महाराज दशरथ जी को श्री रामचंद्र जी की बारात लेकर आने का संदेश भिजवाया गया।
गोस्वामी जी लिखते हैं—
तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाई ।
कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ ॥
तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना।सजहु बरात बजाइ निसाना ॥
अयोध्या में कुल गुरु वशिष्ठ जी ने बारात निकलने का मुहूर्त बताया कि किस दिन, किस समय बारात मिथिला जाने के लिए प्रस्थान करेगी। किंतु विवाह का मुहूर्त अभी नहीं निकाला गया है।
श्री राम जी की बारात सजने लगी। रथ, हाथी, घोड़े आदि सजाए गए।बारात सजने के बाद जनक जी गुरु वशिष्ठ देव, भरत, शत्रुघ्न और प्रिय जनों के साथ चक्रवर्ती जी बारात लेकर मिथिला चले ।ढोल,नगाड़े आदि बज रहे हैं।बारात को मिथिला पहुँचने में चार दिन का समय लगा।
नाचते-गाते बारात मिथिला पहुँची। मिथिला नरेश जनक जी महाराज ने बारात का भव्य स्वागत किया और बारात को जनवासे में स्थान दिया।
श्री राम-लक्ष्मण जी मुनि विश्वामित्र जी के साथ आए और पिताजी से मिले। चक्रवर्ती जी ने श्री राम-लक्ष्मण को हृदय से लगाया।
इधर महल में सीता मैया की सखियाँ आपस में बात कर रही हैं—
एक सखी कहती है —
"मुनि विश्वामित्र के साथ जैसे दो किशोर आए थे , उसी प्रकार के दो राजकुमार बारात में भी आए हैं।"
दूसरी सखी रहती है—
"बारात में जो दो राजकुमार आए हैं उनमें से एक साँवले हैं और एक गोरे हैं।"
तीसरी सखी बोली—
"हमें पता है कि साँवले राजकुमार का नाम 'भरत' है और जो गोरे वाले राजकुमार हैं, उनका नाम 'शत्रुघ्न' है ।"
तभी एक और सखी कहती है—
"ये चारों राजकुमार राजा दशरथ के ही पुत्र हैं अर्थात ये चारों भाई अयोध्या के कुमार हैं ।"
जब सभी को यह पता चला कि ये चारों राजकुमार राजा दशरथ के ही पुत्र हैं, तो सीता मैया की सखियाँ आँचल फैला कर ब्रह्मा जी से प्रार्थना करती हैं—
"हे ब्रह्मा जी! मिथिला में बारात भले एक ही आई है लेकिन आप कुछ ऐसा कर दीजिए कि इन चारों भाइयों का विवाह मिथिला में ही संपन्न हो जाए।"
गोस्वामी जी लिखते हैं—
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं ॥
ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं ॥
विवाह की तिथि निकाली गई। ब्रह्मा जी बारात की ओर से जनवासे में विवाह का मुहूर्त निकाल रहे हैं और महाराज जनक के महल में उनके ज्योतिष विवाह का मुहूर्त निकाल रहे हैं।
गोस्वामी जी लिखते हैं—
मंगल मूल लगन दिनु आवा।हिम रितु अगहनु मासु सुहावा ॥
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू । लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू ॥
विवाह का मुहूर्त निकाला गया। ब्रह्मा जी और ज्योतिषियों ने मिलकर एक ही मुहूर्त निकाला सीताराम जी के विवाह का-
(हेमंत ऋतु, अगहन महीना, शुक्ल पक्ष, पंचमी तिथि, दिन मंगलवार )
(भगवान श्री राम और सीता जी का विवाह रात में ही हुआ है।'गोधूलि बेला' अर्थात संध्या काल की बेला में बारात आई है,रात में विवाह की विधियाँ हुई और ब्रह्म मुहूर्त में विवाह संपन्न हुआ है।)
गोस्वामी जी लिखते हैं—
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल ।
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल।।
विवाह का दिन आया। मंगलवार को धेनुधूरि बेला (गोधूली बेला) जब हुई तो शतानंद जी ने महाराज जनक जी से कहा कि "जनवासे में सूचना भिजवाइए ताकि महाराज दशरथ भगवान श्री राम जी की बारात लेकर आए।"
सूचना मिलते ही गोधूलि बेला में श्री राम जी की बारात सज- धज कर निकली। सभी लोग नाच-गा रहे हैं । आनंद मना रहे हैं। देवता देखकर प्रसन्न हो रहे हैं ।
इतनी सुंदर और अद्भुत बारात देखकर ब्रह्मा जी की मति चकरा गई ।
ब्रह्मा जी शिवजी से बोले —
"क्या किसी और ब्रह्मा जी ने भी इस सृष्टि की रचना की है ! इसकी रचना तो मैंने की ही नहीं ।"
शिवजी बोले —
"आज जगत के माता-पिता का विवाह है इसलिए यहाँ जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, वह सब सीताराम जी के प्रताप से दिखाई दे रहा है।"
शंकर भगवान अपने 15 नेत्रों से, कार्तिकेय भगवान अपने 12 नेत्रों से, ब्रह्मा जी अपने आठ नेत्रों से और इंद्रदेव अपने हजार नेत्रों से भगवान श्री राम के दूल्हा स्वरूप का दर्शन करते हैं।
बारात द्वार पर आई। स्वागत-सत्कार हुआ । जब भगवान राम मंडप में पहुँच तो सबसे अधिक प्रसन्नता सीता मैया की माता सुनैना को हुई।
(जब एक साधारण मनुष्य दूल्हा बनकर जाता है तो सबसे अधिक प्रसन्नता दूल्हे को देखकर उसकी सास को होती है और यहाँ तो साक्षात श्री हरि माता सुनैना के दामाद यानी जामाता बनकर आए हैं सोचिए क्या स्थिति रही होगी!)
भगवान मंडप में बैठे हैं चारों वेद भगवान का विवाह कराने आए हैं। स्वयं भगवान सूर्य नारायण वेश बदलकर ब्राह्मण के रूप में लग्न मंडप में उपस्थित हैं। अग्नि देव स्वयं आहुति लेने के लिए प्रकट होकर बैठे हैं।
मुनियों ने सबसे पहले गणपति भगवान का पूजन कराया ।
सोने की थाल में जल लेकर महाराज जनक जी और माता सुनैना श्री राम जी के पाँव पखारने लगे ।
यह दृश्य देखकर देवता आपस में बोलने लगे—
"देखो! ये वही चरण हैं, जो भगवान शिव के हृदय में बसते हैं।"
"ये वही चरण हैं जिनसे अहिल्या का उद्धार हुआ है।"
"ये वही चरण हैं,जिसे एक बार देखने के लिए ऋषि- मुनि जन्म-जन्मांतर तपस्या करते हैं ।"
"महाराज जनक जी आज उन्हीं चरणों को पखार रहे हैं। पूरे ब्रह्मांड में महाराज जनक जी से सौभाग्यशाली और कोई नहीं हो सकता ।"
सीता मैया का पाणिग्रहण संस्कार हुआ । उसके बाद विधिवत गठबंधन कर के हवन किया गया और भावँरीं पड़ी।
गोस्वामी जी लिखते हैं—
प्रमुदित मुनिन्ह भावँरीं फेरीं । नेगसहित सब रीति निवेरीं ॥
भावँरीं संपन्न होने के बाद मुनियों ने श्री राम जी को आदेश दिया कि अब आप सीता जी की मांग में सिंदूर दीजिए।
गोस्वामी जी लिखते हैं—
राम सीय सिर सेंदुर देहीं । सोभा कहि न जाति बिधि केहीं ॥
अरुन पराग जलजु भरि नीकें । ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें ॥
बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन । बरु दुलहिनि बैठे एक आसन ॥
जैसे ही मुनियों ने आदेश दिया भगवान श्री राम जी ने माता सीता की मांग में सिंदूर दिया। पूरी सृष्टि बोल पड़ी-
बोलिए "सियावर रामचंद्र भगवान की जय"
गुरुदेव जी ने आदेश दिया—
" अब वर और वधू दोनों एक ही आसन पर बैठेंगे। जैसे ही सीता मैया भगवान श्री राम जी के पास जाकर बैठी, राजा दशरथ जी यह जोड़ी देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए।
श्री सीताराम जी का विवाह संस्कार संपन्न हुआ ।
तब उसके बाद महाराज जनक जी के भाई कुषध्वज की बड़ी पुत्री मांडवी का विवाह भरत जी से हुआ।
सीता जी की छोटी बहन उर्मिला का विवाह लक्ष्मण जी से हुआ
शत्रुघ्न जी का विवाह मांडवी मैया की छोटी बहन श्रुति कीर्ति के साथ संपन्न हुआ।
इस प्रकार चारों कुमारों का विवाह जनकपुर में संपन्न हुआ। विवाह संपन्न होने के बाद बारात मिथिला में कई दिनों तक रुकी।
श्रीराम और माता सीता का विवाह केवल एक राजसी विवाह नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा, प्रेम और आदर्श जीवन का दिव्य संदेश है। यह विवाह हमें सिखाता है कि दांपत्य जीवन का आधार केवल आकर्षण नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण, विश्वास और धर्मपालन होना चाहिए।
भगवान श्रीराम ने मर्यादा, विनम्रता और कर्तव्य का आदर्श प्रस्तुत किया, वहीं माता सीता ने प्रेम, धैर्य और पतिव्रता धर्म की सर्वोच्च मर्यादा स्थापित की। श्री सीताराम विवाह यह संदेश देता है कि जहाँ धर्म और प्रेम का संगम होता है, वहाँ स्वयं ईश्वर का वास होता है।
यह दिव्य विवाह समस्त संसार के लिए मंगल, सौभाग्य और आदर्श गृहस्थ जीवन का प्रतीक है। इसलिए आज भी श्रद्धापूर्वक “सीताराम विवाह” का स्मरण करने मात्र से जीवन में सुख, शांति और शुभता का संचार होता है।
।। जय श्री सीताराम ।।
शेष अगले पृष्ठ पर....
1️⃣ राम-सीता विवाह कहाँ हुआ था? (Exact Location)
भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह मिथिला नगरी (जनकपुर) में महाराज जनक के महल में सम्पन्न हुआ था।
2️⃣ राम-सीता विवाह कब हुआ था? (Date, Tithi & Muhurat)
राम-सीता विवाह हेमंत ऋतु के अगहन (मार्गशीर्ष) मास, शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि और मंगलवार को सम्पन्न हुआ था।
3️⃣ राम जी की बारात कहाँ से आई थी?
श्रीराम की बारात अयोध्या से मिथिला आई थी, जिसका नेतृत्व महाराज दशरथ ने किया था।
4️⃣ राम-सीता विवाह में कौन-कौन उपस्थित थे?
इस विवाह में राजा दशरथ, गुरु वशिष्ठ, मुनि विश्वामित्र तथा अनेक ऋषि-मुनि और देवता उपस्थित थे।
5️⃣ क्या चारों भाइयों का विवाह एक साथ हुआ था?
हाँ, राम-सीता विवाह के साथ ही लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतिकीर्ति का विवाह भी सम्पन्न हुआ था।
6️⃣ विवाह में कौन-कौन सी मुख्य रस्में हुईं?
इस विवाह में गणेश पूजन, पाणिग्रहण संस्कार, हवन, फेरे (भाँवर) और सिंदूरदान जैसी वैदिक रस्में सम्पन्न हुईं।
7️⃣ राम-सीता विवाह का धार्मिक महत्व क्या है?
यह विवाह धर्म, मर्यादा, प्रेम और आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक माना जाता है।
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Jai Shri Ram
ReplyDeleteवाह जय श्री राम हरि नारायण
ReplyDeleteजय श्री राम 🙏🏻
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