शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग 46)सीता-स्वयंवर—श्रीराम-सीता का अयोध्या आगमन

Image
  श्री सीता-राम का अयोध्या आगमन   प्रस्तावना: रामजन्म के अलौकिक कारण 🌟✨ (आप सभी ने इसके पहले के पृष्ठों पर भगवान रामजन्म के 5 कारण पढ़े ,जो शिवजी ने माता पार्वती को सुनाए। इन्हीं कारणों के परिणाम स्वरुप भगवान श्री राम ने अयोध्या में अवतार लिया ।) 📚 पूर्व कथाओं की झलक (पिछले भाग की लिंक) 👉 भाग 13 पढ़ें : राम अवतार का प्रथम कारण (जय-विजय का श्राप) 👉 भाग 14 पढ़ें : राम अवतार का दूसरा कारण (वृंदा का श्राप) 👉 भाग 15 पढ़ें : राम अवतार का तीसरा कारण (नारद अभिमान) 👉 भाग 24 पढ़ें : राम अवतार का चौथा कारण (मनु-शतरूपा तप)  👉 भाग 29 पढ़ें : राम अवतार का पाँचवाँ कारण (प्रतापभानु कथा)   इससे पहले के पृष्ठ पर आप सभी ने श्री सीताराम- विवाह प्रसंग पढ़ा । आशा है कि आप सभी को श्री सीताराम-विवाह प्रसंग पढ़कर बहुत आनंद आया होगा!  आइए, अब इस कथा को आगे बढ़ाते हैं — 🚩 विवाह के बाद श्रीराम-सीता का अयोध्या आगमन : गोस्वामी जी लिखते हैं— कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू । सुनि सुनि हरषु होत सब काहू ॥ जनक राज गुन सीलु बड़ाई । प्रीति रीति स...

शिव-पार्वती-संवाद – भाग 3


शिव-पार्वती-संवाद – भाग 3


सती माता यज्ञ मंडप में क्रोधित मुद्रा में, उनके पीछे देवता स्तब्ध खड़े हैं। वह योगाग्नि की ओर हाथ बढ़ा रही हैं, चारों ओर प्रकाश और तेज का प्रभामंडल है — आत्मदाह का दृढ़ संकल्प लिए।



🔸 आत्मदाह का निर्णय :

  पिता के घर स्वयं (सती) का अपमान और यज्ञ मंडप में शिव जी का स्थान ना देख कर सती ने  विकराल रूप धारण कर देवताओं से कहा —


सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥

सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥


> "हे देवगण, मुनिगण! इस सभा में बैठकर आप में से जिसने-जिसने भी मेरे पति की निन्दा की है या निन्दा श्रवण मात्र भी की है, उन सबको दंड मिलेगा।"


माता बोली —


> "शंकर केवल मेरे पति ही नहीं हैं, वे जगत के पिता हैं।

आज मेरे पिता ने मेरे पति का अपमान किया है।

मैं इनकी पुत्री के रूप में जीवित नहीं रहूँगी।"


उसी क्षण मैया ने अपने दाहिने पाव के अंगुष्ठ में योगाग्नि को प्रज्वलित कर स्वयं को भस्म कर लिया।

माता का पूरा शरीर योगाग्नि में दहक उठा।


🔸 शिवजी को समाचार :


नारद मुनि ने जाकर शिव जी को माता सती की योगाग्नि में आत्माहुति की बात बताई।


बाबा ने आवेश में आकर अपनी जटाओं को धरती पर पटका, जिससे वीरभद्र प्रकट हुए।


🔸 वीरभद्र का तांडव :

वीरभद्र का तांडव: यज्ञ मंडप में प्रज्वलित अग्नि के समक्ष क्रोधित वीरभद्र तलवार उठाए हुए, पीछे खड़े हुए देवता और भयभीत ऋषि।

समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥

जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥

भै जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई॥

यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥


भगवान शंकर ने वीरभद्र को कुपित करके भेजा ।

> वहाँ उपस्थित सभी देवताओं को वीरभद्र ने दंडित किया,और दक्ष को अग्निकुंड में जलाकर पूर्ण आहुति दी।


(यह प्रसंग कहता है कि किसी से बदला लेने के लिए अगर आप सत्कर्म भी करते हैं, वह सफल नहीं होता है।)


🔸 यज्ञ की रक्षा :


बाद में भगवान शंकर और श्री हरि को बुलाकर यज्ञ की रक्षा कराई गई।


> जो यज्ञ शिव के बिना आरंभ हुआ था, वही यज्ञ अंत में शिव और हरि की कृपा से पूर्ण हुआ।



📖 शेष कथा अगले भाग में…




📖 अगली कड़ी पढ़ें: शिव-पार्वती-विवाह - भाग 1: सती-पुनर्जन्म

🔹 पोस्ट पढ़ने के लिए धन्यवाद।

📖 कृपया अपनी प्रतिक्रिया पोस्ट पेज पर ही कमेंट के रूप में साझा करें 🙏

💬 आपकी प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

📤 कमेंट करें | साझा करें।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग-13): रामजी के अवतार का पहला कारण — जय-विजय का श्राप और पुनर्जन्म

शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग 29)याज्ञवल्क्य–भारद्वाज संवाद: प्रतापभानु की कथा 5

शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग-14):भगवान राम के अवतार का दूसरा कारण — वृंदा (तुलसी मैया) का श्राप