शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग 45)सीता-स्वयंवर—श्रीराम-सीता का मंगल विवाह

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श्रीराम-सीता का मंगलविवाह : प्रस्तावना: रामजन्म के अलौकिक कारण 🌟✨ (आप सभी ने इसके पहले के पृष्ठों पर भगवान रामजन्म के 5 कारण पढ़े ,जो शिवजी ने माता पार्वती को सुनाए। इन्हीं कारणों के परिणाम स्वरुप भगवान श्री राम ने अयोध्या में अवतार लिया ।) 📚 पूर्व कथाओं की झलक (पिछले भाग की लिंक) 👉 भाग 13 पढ़ें : राम अवतार का प्रथम कारण (जय-विजय का श्राप) 👉 भाग 14 पढ़ें : राम अवतार का दूसरा कारण (वृंदा का श्राप) 👉 भाग 15 पढ़ें : राम अवतार का तीसरा कारण (नारद अभिमान) 👉 भाग 24 पढ़ें : राम अवतार का चौथा कारण (मनु-शतरूपा तप)  👉 भाग 29 पढ़ें : राम अवतार का पाँचवाँ कारण (प्रतापभानु कथा)   🏹 परशुराम जी का प्रस्थान और विवाह की तैयारी : कहि जय जय जय रघुकुलकेतू।भृगुपति गए बनहि तप हेतू ॥ (आप सभी ने पढ़ा कि श्री परशुराम जी समझ गए कि ब्राह्मण में निष्ठा रखने वाले स्वयं श्री हरि ही हो सकते हैं। अतः उन्होंने जान लिया कि ये श्री राम साक्षात ब्रह्म हैं। रघुनाथ जी की जय- जयकार की और तपस्या करने के लिए वन में चले गए।)  आइए कथा को आगे बढ़ाते हैं — ...

शिव-पार्वती संवाद कथा (भाग 20) — नारदजी का अभिमान और श्रीहरि को श्राप

 नारदजी का अभिमान और श्रीहरि को दिया श्राप :

मार्ग में भगवान विष्णु खड़े हैं, उनके दाईं ओर माता लक्ष्मी और बाईं ओर राजकुमारी विश्वमोहिनी विराजमान हैं। विष्णुजी के सामने नारदजी क्रोधित मुद्रा में खड़े हैं।

😡 नारदजी का अपमान और क्रोध :


तुलसीदास जी लिखते हैं —

देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोरि उपहास कराई॥

बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥


नारद जी को जब ज्ञात हुआ कि स्वयं नारायण ने उनके साथ छल किया है, तो उनके क्रोध की सीमा ना रही । चले नारद जी  विष्णु जी से मिलने और मन में सोचते जाते —


 "बैकुंठ जाकर या तो विष्णु को शाप दूँगा या स्वयं प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत में मेरी हँसी कराई!" 


🌸 मार्ग में विष्णु-लक्ष्मी के दर्शन :


 किन्तु भगवान श्रीहरि उन्हें बीच रास्ते में ही मिल गए। इतना ही नहीं एक ओर लक्ष्मीजी और दूसरी ओर वही राजकुमारी विश्वमोहिनी को भी साथ में लिए 


भगवान ने नारद जी से  मीठी वाणी में पूछा—

 "नारदजी ! इस प्रकार व्याकुल हो कहाँ चले ?" 


ये शब्द सुनते ही नारद जी का क्रोध और भी बढ़ गया, माया के वशीभूत होने के कारण उन्हें होश ही नहीं रहा । लगे श्रीहरि को बुरा-भला बोलने ।



🗣️ नारदजी के कटु वचन :


तुलसीदास जी लिखते हैं —

पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी॥

मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु॥


असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।

स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥


परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥

भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥


नारद जी बोले—

 तुम दूसरों की सुख-शांति नहीं देख सकते, तुम्हारे मन में ईर्ष्या और कपट बहुत है। समुद्र मथते समय भी तुमने शिवजी को बहला-फुसलाकर और देवताओं को प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया ।


असुरों को मदिरा और शिवजी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुंदर (कौस्तुभ) मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा छल- कपट का व्यवहार करते हो ।


तुम पूरी तरह स्वतंत्र हो, सिर पर तो कोई है नहीं तुम्हारे । जब जिसके साथ जो मन को करता है, उसके साथ वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। हृदय में हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते ।


कोई तुमसे कुछ नहीं बोलता लेकिन इस बार तुमने मुझे चुनौती दी है ।


⚡ भगवान को श्राप (तीन बिंदु) :


नारद जी बोले—

 तो जाइए मैं श्राप देता हूँ आपको—


१.  जिस राजकुमार का रूप धारण करके आपने मेरे साथ छल किया है, आपको भी अब वही शरीर धारण करना पड़ेगा ।


२.  मुझे आपने वानर बनाया है । जब आप मनुष्य-रूप धारण करेंगे, तब यही वानर आपकी सहायता करेंगे ।


३.  आज जिस तरह मैं विश्वमोहिनी के लिए रो रहा हूँ ; एक दिन अपनी पत्नी के लिए आपको भी रोना पड़ेगा ।


भगवान मुस्कुराए और बोले —

 "स्वीकार है ।" 


शेष अगले पृष्ठ पर....

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Comments

  1. अति सुंदर कथा

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  2. जय श्री राम 🙏
    जय श्री हनुमान 🙏

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